उत्तराखंड बाइक यात्रा 2020

24 oct 2020 को बरेली रेलवे स्टेशन से विकास को साथ लेकर मैं अपनी अपाचे बाइक से उत्तराखंड दर्शन के लिए निकला ,बरेली से निकलते ही झुमका चौराहे पर पहुँचकर विकास ने कुछ फोटो लिये।

फिर मैं मुरादाबाद तक धीरे धीरे अपनी बाइक को चलाता रहा,मुरादाबाद से आगे बाइक बहुत तेज चलाई थी।बाइक चलाते समय भूख बहुत तेज लग रही थी पर कुछ खाने का अच्छा न दिख रहा था तो चलता ही रहा।  2 बजे हम लोग नजीबाबाद पहुँच गए। नजीबाबाद पहुँच कर मैंने और विकास ने एक छोटे से होटल पर चाय पी और समोसे खाये थे बरेली से चलने के बाद नजीबाबाद यह पहला स्टॉप था। लगभग 30 मिनट होटल पर रुकने के बाद मैं और विकास हरिद्वार के लिये चल दिये,हरिद्वार यहां से 50 किलोमीटर था। हम धीरे धीरे हरिद्वार  की तरफ बढ़ रहे थे। हरिद्वार पहुँचने से पहले बाइक में तेल खत्म हो गया तो एक पेट्रोलपंप पर डलवा लिया। हरिद्वार पहुँचने से 09 ,10 किलोमीटर पहले जंगल भी पड़ा था। 


लगभग 4 बजे हम हरिद्वार पहुँच गए। हरिद्वार में हमारे दो और साथी अविनाश और आदित्य पहले पहुँच गए थे। 
अविनाश और आदित्य हमको हर की पौड़ी पर मिले,हम सभी लोग बाइक हर की पौड़ी पर किनारे लगा कर गंगा स्नान के लिये चल दिये। हर की पौड़ी पर गंगा जल को रोक दिया गया। कुंभ आने वाला था तो सफाई हो रही थी। हर की पौड़ी पर जहां सरस्वती माता की मूर्ति लगी है। वहाँ जाकर एक पतली गंगा जल की धार में  स्नान किया। स्नान कर कपड़े पहनकर हम सभी को  भूख सताने लगी थी तो थोड़ी दूर जाकर गंगा मंदिर के सामने हम लोगों ने छोले पूड़ी खाई थी,छोले पूड़ी बहुत ही लजीज और स्वादिष्ट थी। होटल पर तय हुआ कि आज रात ऋषिकेश रुकते हैं पूड़ी खाकर हम लोग दोनो बाइक से ऋषिकेश के लिये निकल पड़े समय रात्रि 8 बजे का था।अपनी बाइक मैं ही चला रहा था। अविनाश और आदित्य बदल बदल के चला रहे थे। हरिद्वार के ट्रैफिक से निकलकर एक जगह हम सभी ने चाय पी थी चाय पीकर  फिर धीरे2 ऋषिकेश के लिए चल पड़े। 1 घंटे बाद हम चारों लोग ऋषिकेश पहुँच गए। ऋषिकेश में कई होटल देखने के बाद भी कोई होटल न मिला समय 9:40 हो गया था। फिर हम लोगों को एक गुरुद्वारा दिख गया। वहाँ बात करने पर रात में रुकने के लिये एक कमरा मिल गया। रात में हम लोग गुरुद्वारा में ही खाना खाकर सो गए। सुबह जल्दी उठकर राम झूला, परमार्थ निकेतन और गीता भवन के आसपास हम लोग घूमे,यहां पर बहुत तेज हवा चल रही थी। 

बाइक से रामझूला पर घूमना एक अलग ही अनुभव था। नीचे माँ गंगा की अविरल धारा अखंड कीर्तन करती हुई बह रही थी। रामझूला पुल के पार बाइक लगाकर हम लोगों ने रामझूला पर आकर खूब फोटो लिये थे। 


उसके बाद मैं बाइक लेकर परमार्थ निकेतन की तरफ चल दिया परमार्थ निकेतन आश्रम पर मेरा चश्मा खो गया था। 

परमार्थ निकेतन एक आश्रम है। यह गंगा के किनारे स्थित है। इसकी स्थापना सन्त शुकदेवानंद ने की थी।
यह आश्रम ऋषिकेश में ठहरने के लिये ऋषिकेश के लिये सबसे सुंदर आश्रमों में से एक है। यहां पर ही गंगा घाट पर सुबह शाम माँ गंगा की भव्य आरती होती है।
मैं कई बार यहाँ पर आरती में शामिल हो चुका था। कोरोना संक्रमण के चलते तीर्थ यात्रियों में भारी कमी देखने को मिल रही थी।  परमार्थ आश्रम के किनारे गंगा घाट पर घूमने के बाद हम लोग वापस रूम की तरफ चल दिये। 
रूम पर सारा सामान पैक कर केदारनाथ के लिए चल पड़े। गुरद्वारा के सामने ही हमने  पेट्रोल डलवाया।अब हम लोग बाइक से केदारनाथ के लिए निकल पड़े थे। सुंदर सुंदर पहाड़ घाटियों से होते हुए बाइक चल रही थी। हम देव प्रयाग की तरफ से केदारनाथ जा रहे थे। ये रोड आज ही खुला था, छोटे वाहन ही इस रोड से जा रहे थे।रोड पूरा खाली था ऐसा लग रहा था कि उत्तराखंड केवल हम 4 लोग ही घूमने आए हैं। बाइक चलाते हुए बहुत अच्छा लग रहा था। 'ऋषिकेश से 30 किलोमीटर निकलकर हम लोगों ने नाश्ता करने का विचार बनाया । एक रेस्टोरेंट पर गाड़ी लगाकर आलू के पराठे,छोले दही और चाय का नाश्ता किया नाश्ता बहुत स्वादिष्ट था। फिर लगभग  30 मिनट  बाद  देवप्रयाग के लिये चलना शुरू किया। रोड बहुत खराब था जगह जगह लैंड स्लाइड हो रहा था। बहुत जगह रोड इसी कारण बंद था," धूल मिट्टी बहुत थी" 'हम लोग जैसे तैसे देवप्रयाग पहुँचे।'
देवप्रयाग संगम तक पहुँचते2 बहुत थकान हो गई थी, पीछे रोड इतना खराब था कि संगम से आगे बाइक चलाने का बिल्कुल मन नहीं था। मैंने विकास से पूछा क्या संगम पर स्नान करोगे?  उत्तर में विकास ने हां कहा। तुरंत हमने बाइक मेन रोड से नीचे ले जाकर देवप्रयाग संगम के पास लगा दी। हम और विकास,अविनाश आदित्य संगम स्नान के लिए अपने अपने बैग ले कर संगम के पास चल दिये। लगभग 30 मिनट खूब स्नान किया,जल बहुत ठंडा था।

देव प्रयाग शहर "अलकनंदा" व भागीरथी के तट के किनारे बसा है। यह उत्तराखंड के पांच प्रयागों में से एक है। यहाँ अलकनंदा जी और भागीरथी जी का संगम होता है। दोनों नदियों की सम्मिलित जलधारा यहां से गंगा का निर्माण करती है। "अलकनंदा" जी बद्रीनाथ से और भागीरथी जी गंगोत्री से आ रही हैं। भागीरथी जी और अलकनंदा जी को सास और बहू भी कहते हैं।

आज मैंने प्रथम बार देव प्रयाग संगम पर दो परम पवित्र नदियों में स्नान किया था ,संगम पर स्नान के बाद थकान बिल्कुल गायब हो चुकी थी, गुड फील हो रहा था। स्नान  के बाद अविनाश ने नमकीन खिलाई थी जो वह अपने घर से लाया था। उसके बाद हम लोग श्रीनगर के लिये चल पड़े। समय 3 बजे का था। खैर हम लोग पहाड़ की सुंदरता को देखते हुए देवप्रयाग से आगे श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे थे। गर्मी सता रही थी पर अब रास्ता  बहुत सुंदर लग रहा था नया रोड बना था। उत्तराखंड की वादियों में बाइक से जो घूमने में मजा है वो मैं आपको इन शब्दों में नहीं बता सकता। देवताओं की भूमि में हम लोग अब श्रीनगर की तरफ बढ़ रहे थे। खूबसूरत पहाड़ी रास्ते और घाटियों से गुजरते हुए हम लोग डेढ़ घण्टे बाद माँ धारी देवी के मंदिर पहुँचे। 

अब लगभग हल्का हल्का अंधेरा होने लगा था। शाम का समय था। मां धारी देवी मंदिर अलकनंदा नदी के बीचोबीच बना एक सुंदर मंदिर है। उत्तराखंड के लोगों का मानना है यह माता उत्तराखंड के सभी तीर्थों की रक्षा कर रहीं हैं। उत्तराखंड के लोग केदारनाथ आपदा 2013 महाजल प्रलय का कारण धारी देवी मंदिर को अपने स्थान से विस्थापित करना मानते है। यहाँ माता की कई रूपों की पूजा होती है।
इस मंदिर के दर्शन कर हम लोग रुद्रप्रयाग की तरफ चल दिये लगभग अंधेरा हो चुका था। रुद्रप्रयाग पहुँचने से पहले ही रात के लगभग 7 बज गए थे। रुद्रप्रयाग पहुँचने से पहले एक होटल पर  रूककर चाय पी थी। इस होटल पर तय हुआ कि रात हो चुकी है पहाड़ी सड़क है सड़क से अनजान हैं रुद्रप्रयाग में कहीं होटल लेकर रूक जाते हैं। पर रात के अंधेरे में जब हम लोगों को पता ही न चला कि हम लोग रुद्रप्रयाग से आगे निकल आये हैं। रुद्रप्रयाग पीछे 2 किलोमीटर छूट गया हैं। फिर हम सभी लोगों ने सोचा कि अब जहां कमरा मिलेगा वहीं कमरा ले लेंगे। पर रात को कहीं भी कोई भी होटल नहीं दिख रहा था। पहाड़ी घुमावदार सड़कों से और जंगली जानवरों से बिल्कुल अंजान हम 4 लोग दो बाइक से गुप्त काशी पहुँचने वाले थे। गुप्तकाशी पहुँच कर रात के 11 बजे एक होटल मिल गया तो हम लोगों ने यही होटल ले लिया। यह गुप्त काशी से आगे 3 किलोमीटर पर था। बाइक रोड किनारे लगाकर होटल पर जाकर मैं सो गया। सुबह 7 बजे उठकर नहा धोकर हम सभी लोग नीचे रोड परआए, होटल से लगे एक खाने के होटल पर हम सभी ने चाय और आलू के पराठे का नाश्ता किया। उसके बाद हम सभी लोग बाबा केदारनाथ के लिए दोनो बाइक से चल पड़े। 
लगभग 12 बजे हम लोग सोनप्रयाग पहुँचे। सोनप्रयाग बाइक स्टैंड पर बाइक लगाकर गौरी कुंड के लिए 20 रुपये देकर टैक्सी पर बैठ कर चल दिये। 12:30 पर हम लोगों ने केदारनाथ यात्रा की पैदल चढ़ाई शुरू की। शुरू करते ही लगभग 2 किलोमीटर बाद हम सभी ने मैगी खाई थी ,और चाय पी थी।

उसके बाद मैं आराम से चढ़ाई करता रहा। शाम 5 बजे मैं रामबाड़ा पहुँचा। रामबाड़ा पर जल का बहाव बहुत तेज था। कुछ समय रामबाड़ा में  रूककर मंदाकिनी घाटी को निहारता हुआ मैं आगे की ओर बढ़ रहा था। रामबाड़ा से 1 किलोमीटर विकास अविनाश आदित्य मिले थे। एक चाय साथ में पी थी यहाँ पर अब अंधेरा हो चुका था। ठंड लगने पर मैंने जैकेट निकालकर पहन ली थी।
 चाय पीकर  बड़ी लिंचोली पर विकास ने मुझसे खाना खाने का निवेेेदन किया लेेेकिन थकान के कारण मैं बिना खाना खाए सो गया। सुुुबह उठकर पुनः केदारनाथ की आगे की चढ़ाई शुरू कर दी। थकान अभी उतरी न थी ।


 11 बजे बाबा के धाम पहुँचे। मैं प्रसाद और मंदाकिनी से जल लेकर मंदिर की लाइन में लग गया,एक पंडित जी को कुछ पैसे देकर बाबा केदार की पूजा करवाई। उसके बाद मैंने बाबा केदारनाथ के दो बार दर्शन किये। बाबा केदारनाथ की परिक्रमा करके असीम शांति का अनुभव हो रहा था।
लगभग एक घंटे बाद मैंने पुनः नीचे की ओर चलना शुरू किया। धाम में एक जगह पर तहरी का भंडारा चल रहा था मैंने वहाँ पर तहरी खाई थी मैं तहरी खा ही रहा था कि पीछे से विकास अविनाश,आदित्य आ गए। फिर मैं तहरी खाकर गौरीकुंड के लिए चल पड़ा। मैं बहुत धीरे2 नीचे उतर रहा था। कुछ देर बाद विकास मुझसे आगे निकल गया था। रामबाड़ा मैं 6 बजे पहुँचा था  फिर धीरे 2 चलता रहा तो गौरीकुंड मैं रात के 9 बजे पहुँचा था। विकास,और अविनाश ने यहां एक होटल ले लिया था। विकास तुरंत  रोड से ही हमको होटल ले गया। 1 गिलास पानी पीकर थकान के कारण मैं तुरंत ही सो गया। इस तरह से हम बाबा केदारनाथ के दर्शन 2020 में कर चुके थे। 
*****
अगले दिन सुबह उठकर नहा धोकर रूम पर ही हम सभी ने चाय पी उसके बाद रूम से हम लोग गुप्तकाशी के लिये निकले। गुप्तकाशी वाले होटल पर पहुँचकर सामान पैक कर हमको तुंगनाथ के लिये निकलना था।सामान पैक कर कुछ ही देर में हम लोग चोपता तुंगनाथ के लिये चल दिये। चोपता तुंगनाथ  लगभग 80  किलोमीटर था।,मैंने पहाड़ी सड़क पर धीरे धीरे से चलने का निर्णय लिया। रास्ते में एक दो जगह बाइक को दिखाया और हम धीरे धीरे  खूबसूरत वादियों को देखते हुए बाइक से चोपता की तरफ बढ़ रहे थे। रास्ते में कई जगहों पर बाइक को रोककर फोटो वीडियो विकास ने लिये थे।
केदारनाथ वन्यजीव अभ्यारण्य का हिस्सा होने की वजह से चोपता में कई प्रकार के वन्यजीवों की दुर्लभ प्रजातियां भी पाई जाती इनमें भी कस्तूरी मृग और उत्तराखंड का राज्य पक्षी मोनाल का नाम प्रमुखता से आता है। उच्च हिमालय में जंगली जानवरों का खतरा भी लगा रहता है। यह हिमालय का सबसे सुंदर प्लेस है।
चोपता उत्तराखंड में एक बहुत ही सुंदर और अनजान हिल स्टेशन है जिसकी प्राकृतिक खूबसूरती और हरियाली आपको अंदर तक आनंदित कर देगी। यहाँ की नम हवा में बसी और दरख्तों से लिपटी सौंधी-सी खुशबू आपके तन-मन को तरोताजा कर देंगी। यहाँ पहुँच आपकी आत्मा उत्साह और संतुष्टि से भर जाएगी। यहाँ के पर्वतों में अलग ही जादू है। यहाँ हर दम चलती ठंडी-ठंडी हवाएं, मिटटी की वह मनमोहक खुशबू,घने जंगल हमें दूसरी ही दुनिया में ले जायेंगे। चोपता उत्तराखंड के आकर्षक हिल स्टेशनों में से एक है। यह उत्तराखंड में उखीमठ के रास्ते पर गढ़वाल क्षेत्र में बसा हुआ है। 
उत्तराखंड के दिलफरेब नजारे देश ही नहीं पूरे विश्व में विख्यात हैं। चोपता में जब बर्फ पड़ती है, तो ये जगह स्विट्जरलैंड से कम नहीं लगती.और सड़कों, पहाड़ों और पेड़ों पर जमी बर्फ स्वर्ग जैसा नजारा पेश करती है.


लगभग शाम के 3 बजे हम लोग चोपता पहुँचे। कमरा लेने में 3:30 बज गया। कमरा 700 का मिला था फिर हम लोगों ने तुंगनाथ की चढ़ाई शुरू की। इस यात्रा के शुरुआत में विकास मेरे साथ ही रहा,विकास ने ट्रेक के  शुरुआत में खूब फोटो लिये। 
इस ट्रेक पर मेरे साथ एक पानी की बोतल भी थी। जिससे मैं चढ़ाई के दौरान अपनी आवश्यकता अनुसार पानी पीता रहा।
धीरे 2 हम लोग  तुंगनाथ बाबा के दरबार की तरफ बढ़ रहे थे। इस ट्रेक पर सबसे सुंदर नजारे देखने को मिल रहे थे। जो मैंने अभी तक की यात्रा पर नहीं देखे थे। हम लोग बाबा तुंगनाथ के दर्शन के लिये पहली बार जा रहे थे। 
इस ट्रेक पर चौखंबा और केदार वैली का सुंदर नजारा देखने को मिल रहा था। मेरे पीछे जो पहाड़ों पर बर्फ दिख रही है यही चौखंबा है चौखंबा का अर्थ है चार स्तम्भ, यह गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर शिखरों में से एक है। यह गंगोत्री के मुख्य शिखर के रूप में जाना जाता है। यह पश्चिमी गढ़वाल का सबसे ऊंचा पर्वत है।
अभी केदारनाथ ट्रेक की थकान भी न उतरी थी और हम तुंगनाथ ट्रेक की चढ़ाई कर रहे थे। धीरे धीरे रो धो कर हम तुंगनाथ बाबा के दर्शन के लिये चढ़ रहे थे। 
पीली ग्रिल के पास पहुँच कर एक भक्त से बात की तो पता चला कि अभी थोड़ा सा ही समय बचा है जल्दी चले जाओ तो शाम की आरती आपको देखने को मिल जाएगी तो फिर हम लोग जल्दी जल्दी चढ़ाई करने लगे थे। 

कई जगहों पर  रूककर बैठकर आराम कर हम 7 बजे तुंगनाथ बाबा के दरबार में पहुँचे। मंदिर में  शाम की आरती  हो चुकी थी,मंदिर बंद होने वाला था। जब मैंने दर्शन किये उसके1 मिनट बाद मंदिर का गेट पुजारी जी ने बंद कर दिया। मंदिर में दर्शन के बाद नीचे उतरना 
था ।यहां पर जंगली जानवर का बहुत खतरा था।रात के 9 बज गए थे। चोपता का बहुत ही सुंदर नजारा रात को दिख रहा था। मोबाइल की लाइट जलाकर हम लोग ट्रेक से नीचे उतर रहे थे। लगभग 10 बजे हम लोग चोपता पहुँच गए। चोपता पहुँच कर गेट के सामने वाले होटल पर खाना खाकर मैं अपने कमरे पर जाकर सो गया। अगले दिन फिर मैंने चोपता भ्रमण का प्लान बनाया लगभग इधर उधर 2 घंटे तक चोपता में घूमा। सामने केदार पीक और चौखंबा का सुंदर नजारा दिख रहा था। 

लगभग 12 बजे हम और विकास चोपता से बद्रीनाथ के लिये निकले थे। निकलते वक्त तुंगनाथ गेट के सामने फोटो लिये थे। 
गोपेश्वर के पास एक होटल पर विकास ने पराठा खाया, 'मैंने चमोली में खाने का निर्णय लिया। गोपेश्वर से चमोली तक बाइक चलाने में बहुत मजा आया था क्यों कि ढलान  की वजह से  गाड़ी  अपने आप चल रही थी मैंने लगभग 5,6 किलोमीटर ऐसे ही बाइक चला ली, यह सुविधा केवल पहाड़ों पर ही मिलेगी " कि ढलान पर आपकी बाइक अपने आप चलने लगे"। 
खैर बाइक से उत्तराखंड घूमने में बहुत मजा आ रहा था पर  अब थकान बहुत हो रही थी तो इस कारण ज्यादा अच्छा नहीं लग रहा था। यहां के घुमावदार सड़कें  दिखने में भी बहुत सुंदर लगती हैं कई जगह बाइक रोककर फोटो क्लिक करवाए थे। कुुुछ ही देर में हम लोग जोशी मठ पहुँच गए, वहाँ तय हुआ कि आगे नहीं जाएंगे,रोड बहुत खराब है। और मुझे पहाड़ का कोई भी अनुभव नहीं था तो हम लोगों ने जोशीमठ में ही कमरा लेना उचित समझा..जोशीमठ में मेंन मार्केट में एक कमरा तुरंत ले लिया। कमरे में जाकर नहाकर  जोशीमठ भ्रमण पर निकला। थोड़ी देर बाद घर पर बात करके मैं अपने रूम पर आकर सो गया।

*****
दूसरे दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान कर हम लोग बद्रीनाथ के लिये निकले। फिर हम लोगों ने जोशीमठ में नृसिंह मंदिर के दर्शन किये।
नरसिंह मंदिर एक हिन्दू मंदिर है जो भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह को समर्पित है। यह मंदिर भारत के राज्य उत्तराखंड के चमोली जिले के जोशीमठ में स्थित है। नरसिंह मंदिर जोशीमठ के सबसे लोकप्रिय मंदिरों में से एक है। इस मंदिर को नरसिंह बदरी या नरसिम्हा बदरी भी कहा जाता है। नरसिंह मंदिर को जोशीमठ में नरसिंह देवता मंदिर के नाम से जाना जाता है। नरसिंह को अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा करने के लिए एवं राक्षस हिरण्यकशिपु का वध करने के लिए जाना जाता है ।
नरसिंह मंदिर में मुख्य मूर्ति जो आधा शेर और आधा नर(मनुष्य)  के रूप में  है, भगवान विष्णु के चौथे अवतार हैं। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर की स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। मंदिर में स्थापित भगवान नरसिंह की मूर्ति शालिग्राम के पत्थर से बनी है। इस मूर्ति का निमार्ण आठवी शताब्दी में कश्मीर के राजा ललितादत्य युक्का पीडा के शासनकाल के दौरान किया गया था। ऐसा भी माना जाता है कि नरसिंह देवता की यह मूर्ति स्वंय भू है। यह प्रतिमा 10 इंच (25 सेमी) ऊंची है और कमल की स्थिति में बैठे भगवान को दर्शाती है।

नरसिंह बदरी मंदिर की कथा भविष्य बदरी मंदिर की पौराणिक कथा से निकटता से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि मूर्ति की बायीं भुजा समय के साथ कम होती जा रही है और अंत में जब गायब हो जाएगी तब  बदरीनाथ का मुख्य मंदिर व बदरीनाथ धाम का रास्ता अवरुद्ध व दुर्गम हो जायेगा। तब भगवान बदरी , भविष्य बदरी मंदिर में भी दर्शन देगें।
यह भगवान बद्रीनाथ जी का शीत कालीन प्रवास स्थल है। जब बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं तो भगवान बद्रीनाथ की पूजा यहींं होती है। मंदिर के दर्शन करने के बाद हम लोग बदरीनाथ चल दिए। हमारे साथ 2 अलकनंदा जी भी अखंड कीर्तन करती हुई चल रही थीं। 
पहाड़ों पर बाइक चलाने का अपना ही मजा है। जब यहां की सड़कें सर्दियों में बर्फ की चादर ओढ़ लेती हैं और उच्च हिमालयी क्षेत्रों में सन्नाटा हो जाता है। उस समय ऐसी खतरनाक सड़कों पर बाइक लेकर जाना भी किसी रोमांच से कम नहीं है। इतने खूबसूरत पहाड़ मैं पहली बार देख रहा था। वास्तव में  उत्तराखंड को देवभूमि क्यों कहते हैं,यह अब मैं समझ गया था। 12 बजे हम लोग बद्रीनाथ पहुँच गए। बद्रीनाथ में एक बहुत ही सुंदर होटल विकास ने ले लिया। होटल में नहा धोकर मैं बद्रीनाथ दर्शन के लिये निकला। 1 घंटे में मुझे बद्रीनाथ जी के दर्शन प्राप्त हो गए। फिर एक घंटे मंदिर में रूकने के बाद अपने होटल की तरफ चल पड़ा। होटल से लाल जैकेट पहनकर मैं फिर मंदिर के पास आ गया। 
 बद्रीनाथ मंदिर उत्तराखंड के चमोली जनपद में अलकनन्दा नदी के तट पर स्थित है। कुछ ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिससे यह कहा जा सकता है कि इस मंदिर का निर्माण 7वीं-9वीं सदी में हुआ था। मंदिर के आस-पास जो नगर बसा हुआ है उसे बद्रीनाथ ही कहा जाता है। यहां मंदिर के पास कुछ भक्तों की भीड़ थी। कोरोनाकाल का असर बद्रीनाथ में भी दिख रहा था। 

भारत के चार धामों में बदरीनाथ सुप्रसिद्ध  है. बद्रीनाथ धाम ऎसा धार्मिक स्थल है, जहां नर और नारायण दोनों मिलते है। बद्रीनाथ धाम में श्री भगवान विष्णु जी की पूजा होती है। यह धाम हिमालय के सबसे पुराने तीर्थों में से एक है। मंदिर के मुख्य द्वार को सुन्दर चित्रकारी से सजाया गया है। मुख्य द्वार का नाम सिंहद्वार है। बद्रीनाथ मंदिर में चार भुजाओं वाली काली पत्थर की बहुत छोटी मूर्तियां है। यहां भगवान श्री विष्णु पद्मासन की मुद्रा में विराजमान है।
 बद्ररीनाथ में अधिकाँश दुकानें बंद थीं। रात्रि 8 बजे तक मैं मंदिर के आसपास रहा। फिर एक होटल से खाना खाकर मैं  अपने होटल पर जाकर सो गया।

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सुबह उठकर मैं फिर लगभग 9 बजे बद्रीनाथ मंदिर के दर्शन के लिए निकला। इस समय मंदिर में लाइन बहुत लंबी लगी थी। मैंने लाइन में लगकर बद्रीनाथ के दर्शन करना उचित समझा। बद्रीनाथ के दर्शन होने में लगभग 2 घंटे लग गए। बद्रीनाथ मंदिर में हमको बद्रीनाथ जी का भोगप्रसाद खाने का अवसर भी प्राप्त हुआ। फिर जब हम वापस लौट के होटल आए तो 2 बज गए थे। तुरंत सामान पैक करके हम होटल के बाहर आ गए। बाइक स्टार्ट करके  हम लोग अब बद्रीनाथ जी से चल चुके थे। 5 बजे हम लोग जोशीमठ पहुँचे। यहाँ पर एक अजीब घटना घटी। मैंने एक पेट्रोल पंप पर पेट्रोल डलवाया और गाड़ी स्टार्ट करके मैं 300 मीटर की दूरी तक चला गया,हेलमेट पहनने की वजह से मुझे पता ही न चला,कि विकास नहीं बैठा है। फिर एक दुकान पर मैंने बाइक रोकी तो देखा विकास नहीं है। एक मिनट बाद फिर पीछे बाद देखा तो विकास आ रहा था। मुझे अपने गलती पर महसूस हो रही थी,पर हेलमेट की वजह से पता नहीं चल पाया था। फिर विकास को लेकर मैं बाइक से चमोली की तरफ चल दिया,चमोली से निकलने में शाम हो चुकी थी,मैं धीरे -धीरे बाइक चलाता रहा, लगभग 7बजे हम कर्णप्रयाग पहुँचे। तय हुआ कि यहीं रूक जाते हैं। तुरंत कर्णप्रयाग में मेन मार्केट में एक होटल ले लिया।
 तुरंत  होटल में सामान रखकर मैं खाना खाने निकला उसी होटल के नीचे खाने का होटल था। वहीं जाकर दाल तंदूरीरोटी चावल खाए उस दिन खाना बहुत स्वादिष्ट लगा था। अब रात के 9 बज चुके थे। होटल में नीचे बाइक लगाकर मैं रूम में सोने चला गया। 
सुबह उठकर मैं, विकास चाय पीकर घर वापसी के लिए बाइक से  चल दिये। वापसी के दौरान हल्द्वानी अल्मोड़ा रोड पर आदिबद्री का मंदिर पड़ा था। हम और विकास ने इस मंदिर में भी गेट के बाहर से ही दर्शन किये थे। 
                          आदि बद्री
हम लोग घर वापसी कुमायूं डिवीजन से कर रहे थे। लगभग 1 घंटे चलने के बाद हम लोगों ने एक होटल पर चाय पी और समोसे खाये थे। फिर रानीखेत होते हुए बाबा नीमकरौली धाम पहुँचे थे। नीम करौली धाम में हमको विकास के और भी मित्र (महेश तिवारी)भैया मिले थे।
नीमकरौली धाम उत्तराखंड में नैनीताल के निकट स्थित है। यह पवित्र स्थान बाबा नीमकरौली बाबा की तपोभूमि है। इस धाम की प्रसिद्धि विदेशों तक है। नीम करौली बाबा हनुमान जी के परम भक्त थे। मान्यता है,कि इस धाम में मांगी गई मन्नत कभी खाली नहीं जाती है।
यह  बहुत पवित्र धाम है। फेसबुक के मालिक "मार्क जुकरबर्ग" नीम करौली बाबा के भक्तों में से एक हैं। कुछ ही देर में नीम करौली बाबा के दर्शन हमको प्राप्त हो गए थे। नीम करौली बाबा के दर्शन कर असीम शांति का अनुभव हो रहा था। 
नीम करौली बाबा के दर्शन कर हम लोग भीमताल की  तरफ चल दिये। लगभग एक घंटे बाद हम लोग भीमताल पहुँचे। 30 मिनट घूमने के बाद हम लोग भीमताल से चल दिये। हल्द्वानी तक पहुँचने में ही रात हो गई थी। हम धीरे2 बाइक से चलते रहे ,लगभग रात 10 बजे बरेली पहुँच कर उत्तराखंड की बाइक यात्रा 2020 समाप्त हुई थी...

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