गंगोत्री दर्शन
उत्तराखंड के चार पवित्र धामों में एक "गंगोत्री उत्तरकाशी " जिले में स्थित है। गंगोत्री धाम समुद्र तल से 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
हमारे पुराणों व अन्य धार्मिक ग्रंथों में इस धाम की महिमा वर्णित है। राजा भागीरथ ने इसी जगह पर 5500 वर्षों तक तपस्या कर राजा सगर के पुत्रों के उद्धार हेतु गंगा मैया को नदी के रूप में उतरने के लिए प्रसन्न किया था। तभी इस पवित्र तीर्थ का नाम गंगोत्री पड़ा। इसका अर्थ है "गंगा जहां स्वर्ग से उतरी उसी स्थान को गंगोत्री कहा जाने लगा।"
हर साल गंगोत्री में गंगा मंदिर के कपाट अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर खोले जाते हैं तथा कार्तिक माह में दीपावली के दिन बंद कर दिए जाते हैं। यह हिंदुओं का एक धार्मिक स्थान है।
24 अक्टूबर 2019 को शाम 7 बजे मैं गंगोत्री यात्रा के लिये घर से निकला,लगभग 8 बजे शाहजहांपुर रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया। जनता एक्सप्रेस एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय 9 बजे आई, मैं ट्रेन में आराम से बैठ गया। कुछ समय में ट्रेन चल दी। और मैं सुबह लगभग 5 बजे हरिद्वार रेलवे स्टेशन पहुँच गया।ट्रेन ने अपने निर्धारित समय पर हरिद्वार पहुँचा दिया था। हरिद्वार स्टेशन के सामने एक होटल पर चाय नाश्ता कर मैं बाहर आया। मेरी यह सोलो ट्रिप थी। हरिद्वार स्टेशन से कुछ ही दूरी पर बस स्टेशन है। बस स्टेशन पर जाके पता किया तो एक बस उत्तरकाशी तक के लिये मिल गई। मैं तुरंत ही बस में बैठ गया 'बस खाली थी। एक घंटे बाद बस लगभग 6 बजे हरिद्वार बस स्टेशन से चली।
थकान के कारण मैं कुछ ही देर में सो गया था। लगभग 2,3 घण्टे बाद चंबा के पास किसी होटल पर नाश्ता के लिये रुकी थी। यहां पर मेरी नींद खुल गई और मैंने यहां पर चाय पी थी,जिससे कि नींद न लगे। बस लगभग 30 मिनट बाद यहां से फिर चली थी। अब मैं आराम से बस में बैठकर पहाड़ों का आनंद ले रहा था। रास्ता पतला था और खराब था कहीं -कहीं पर बहुत ही खराब था। बस ने लगभग उत्तरकाशी 3 बजे उतार दिया। मैं यहाँ पहली बार आया था और गंगोत्री भी पहली बार जा रहा था।
उत्तरकाशी बस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर टैक्सी स्टैंड है। यहां पर गंगोत्री के लिये टैक्सी मिल जाती है। मैं टैक्सी स्टैंड पर गया, "टैक्सी वाले से बात की"तो वह बोला अगर सवारी हो जाएगी तो गंगोत्री चलूँगा। एक घण्टे तक इंतजार करने के बाद भी उसकी सवारी 3 से ज्यादा न हुई। मैं तुरंत गंगोत्री जाने का विचार त्यागकर उत्तरकाशी में होटल देखने चल दिया। टैक्सी स्टैंड से कुछ दूरी पर ही एक मंदिर के पास 500 में एक होटल मिल गया। होटल के सामने भागीरथी नदी का दृश्य बहुत ही सुंदर लग रहा था। भागीरथी नदी कल - कल करती हुई अखंड कीर्तन कर रही थी। मैं रूम में तुरंत कपड़े लेकर भागीरथी नदी में स्नान करने चल दिया। लगभग 2 डुबकी लगाने के बाद ही अहसास हो गया कि जल बहुत ठंडा है। शाम हो गई थी, अंधेरा हो चला था। ठंड बहुत लग रही थी। अब जल्दी से जल्दी मैं होटल पहुँचना चाहता था। कुछ ही देर में मैं होटल पहुँच गया।
रात के 8 बजे मैं उत्तरकाशी घूमने निकला। स्थानीय लोगों से पता चला कि यहां पर विश्वनाथ मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध है। गंगोत्री जाने वाले तीर्थ यात्री विश्वनाथ मंदिर में दर्शन जरूर करते हैं। मैं तुरंत ही बाबा विश्वनाथ के दर्शन करने के लिये मंदिर में चला गया। मंदिर बहुत सुंदर और भव्य था।कुछ ही समय में दर्शन हो गए ,मंदिर मेन बाजार के पास ही है।। मंदिर में दर्शन के बाद भूख लगी थी। मुख्य बाजार के पास फिर एक होटल में दाल चावल रोटी फूलगोभी की सब्जी खाकर मैं अपने होटल पर जाकर सो गया।
सुबह 7 बजे उठकर टैक्सी स्टैंड पहुँचा,तो पता चला कि टैक्सी तो हैं पर इनकें ड्राइवर गायब हैं। कुछ समय बाद टैक्सी गंगोत्री या हरसिल जाएगी।
यहीं पर हमने चाय और ब्रेड का नाश्ता किया। कुछ देर बाद एक टैक्सी हरसिल के लिये मिल गई। टैक्सी में मैं सबसे आगे बैठकर चल दिया। टैक्सी वाले ने लगभग 3,4 घंटे बाद हरसिल पहुँचा दिया। मैं टैक्सी से उतर कर तुरंत हरसिल भ्रमण पर निकल लिया। अब यहां से मेरा हरसिल भ्रमण का कार्यक्रम शुरू हुआ था। यहां पर सेब के बागान बहुत थे ,जो दूर से आकर्षित कर रहे थे। यहां पर मैंने सेब के बागान पहली बार देखे थे।
हरसिल का सेब पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। हरसिल हिंदुस्तान की सबसे खूबसूरत जगहों में से एक है। हरसिल अपनी खूबसूरती के लिये पूरे विश्व विख्यात है।यह भागीरथी नदी के किनारे बसा एक सुंदर शहर है। यहां की घाटियाँ बहुत सुंदर हैं। हरसिल घाटी में सेब के बागानों के बीच बने छोटे -छोटे होम स्टे, यहां की सुंदरता में चार चांद लगा रहे थे। यही होम स्टे भागीरथी नदी के किनारे तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को हरसिल रोकने को मजबूर करता है। भागीरथी की वैभवता और छोटी-छोटी निर्मल जल धाराएं मन को लुभा रहीं थीं।
फिल्म राम तेरी गंगा मैली के उस खूबसूरत लोकेशन का नाम है हरसिल, जो उत्तराखंड, गढ़वाल के उत्तरकाशी जिले में स्थित एक पहाड़ी शहर है। जो भागीरथी नदी के किनारे बसा है। हरसिल अपनी खूबसूरती के लिये पूरे देश में विख्यात है। कई हिंदी फिल्में यहाँ पर बन चुकी हैं।
लगभग चार पांच घंटे हरसिल में सुंदर घाटियों , सेब के बागान और शानदार झरने देखने के बाद मैं धराली पहुँच गया। धराली में कुछ घंटे मैंने सेब के बागानों में बिताए। मुखवा गंगा मैया का शीतकालीन प्रवास स्थल है। कपाट बंद होने के बाद गंगा मइया की पूजा मुखवा गाँव में होती है। धराली घूमने के बाद एक बस से मैं गंगोत्री पहुँच गया। गंगोत्री पहुँचने में ज्यादा समय न लगा।
बस वाले ने गंगोत्री से एक किलोमीटर पहले उतार दिया। अब मैं गंगा मईया की शरण में आ चुका था। गंगोत्री 1 किलोमीटर का बोर्ड मुझे दिख रहा था। धीरे धीरे मैं पैदल ही मैं गंगोत्री मंदिर की तरफ बढ़ रहा था। रास्ते में बहुत होटल थे। शीतकाल के कारण गंगोत्री में भीड़भाड़ बिल्कुल नहीं थी। लगभग 10 मिनट चलने के बाद मंदिर आ गया। मैंने रूम मंदिर के पास ही लेने का विचार बनाया था। मंदिर के पास एक दो होटल में रूम देखने के बाद 300 रु में एक छोटा सा कमरा मिल गया। मैंने तुरंत रूम ले लिया। यह मंदिर के बहुत ही पास में था। लगभग 15 मिनट रूम में आराम करने के बाद मैं अपने कपड़े तौलिया सामान लेकर मंदिर से लगी हुई लगभग 15, 20 सीढ़ियों से उतरते हुए भागीरथी के तट पर पर स्नान करने पहुँच गया। यहां पर बहुत सारे श्रद्धालू स्नान कर रहे थे। कुछ श्रद्धालू भागीरथी तट पर पूजा अर्चना की तैयारी कर रहे थे। कुछ श्रद्धालु अपने पूर्वजों के उद्धार के लिये व परिवार में सुख शांति के लिये यहाँ पूजा अर्चना करवा रहे थे। फिर कुछ समय बाद मां गंगा भागीरथी के पावन तट पर मैंने स्नान किया। जल बहुत ठंडा था। जल्दी से स्नान करके मैं गंगा मंदिर मंदिर में दर्शन करने पहुँचा। कुछ ही समय में गंगा मइया का आशीर्वाद लेकर मैं मंदिर के बाहर आ गया।
माँ गंगा के दर्शन कर असीम शांति की अनुभूति हो रही थी।
हिमालय की गोद में बसा यह पवित्र तीर्थस्थल जहां माँ गंगा ने धरती को कृतार्थ किया था। धार्मिक पुराणों के अनुसार स्वर्ग की बेटी माँ गंगा ने नदी का रूप लेकर भागीरथ के पूर्वजों को पापमुक्त किया और उनका उद्धार किया था। पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने मां गंगा के वेग को कम करने के लिये उन्हें अपनी जटाओं में ले लिया था। प्रतिवर्ष लाखों श्रद्धालु माँ गंगा के दर्शन के लिये आते हैं। पर इस समय ज्यादा श्रद्धालू नहीं दिख रहे थे। अब मुझे भूख लगने लगी थी। मंदिर के पास एक छोटे से रेस्टोरेंट में मैंने मैंगी खाई थी। होटल वाले से पता चला कि पास में सूर्य कुंड है। मैगी खाकर मैं सूर्यकुंड की तरफ घूमने गया। बहुत ही सुंदर नजारा था। सूर्यकुंड में काफी ऊँचाई से झरना गिर रहा था जो बहुत ही सुंदर लग रहा था। शाम का समय था। कुछ देर सूर्यकुंड देखने के बाद हम वापस गंगा मंदिर आ गए। गंगा मंदिर पर इस समय शाम की आरती की तैयारी चल रही थी। मैं पहली बार माँ गंगा की आरती गंगोत्री में देख रहा था। असीम शांति का अनुभव हो रहा था। आरती के पश्चात मैं 1 घन्टे मंदिर में ही रहा। अब रात के 8 बज चुके थे। भूख भी लगने लगी थी। गंगा मंदिर के पास में ही खाने के बहुत सारे होटल हैं। मैंने एक होटल में जाकर दाल चावल रोटी और गोभी की सब्जी का रात्रि भोजन किया था। भोजन के पश्चात ठंड अब लगने लगी थी। कुछ देर मंदिर के आसपास घूमने के पश्चात मैं पुनः मंदिर में पहुँच गया। अब मंदिर बंद हो चुका था। फिर मैंने अपने रूम पर चलने का विचार बनाया। अब ठंड बहुत बढ़ गई थी। रूम के बाहर एक कुछ लोग आग जलाकर हाथ पैर सेक रहे थे। यहीं पर एक स्वामी जी से धर्म चर्चा हुई थी जो श्रीनगर से यहां पर माँ काली का यज्ञ करने आये थे। लगभग 30 मिनट के बाद मैं अपने रूम में जाकर सो गया। सुबह 4 बजे नींद खुली अपना सामान बैग में रख कर हाथ में गंगाजल से भरी बोतल लेकर मैं रूम से बाहर आया। गंगाजल मैंने रात को ही भर लिया था। अभी सुबह नहीं हुई थी अंधेरा ही था। मां गंगा मंदिर में कोई दूर दूर तक नहीं था। अभी मंदिर बंद था। कुछ देर मंदिर में बैठकर माँ गंगा का आशीर्वाद लेकर मैं अपनी बस की तरफ चल पड़ा। यहां से हरिद्वार या ऋषिकेश के लिए बस सुबह 5 बजे ही जाती है। बस मंदिर से कुछ ही दूरी पर खड़ी थी। बस में आराम से सीट मिल गयी थी। आराम से सोते हुए मैं कब ऋषिकेश पहुँचा ये याद नहीं है। फिर एक दिन हरिद्वार में रुक कर मैं जनता एक्सप्रेस से अपने घर शाहजहाँपुर चला आया था।

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