बद्रीनाथ यात्रा



          बहूनि सन्ति तीर्थानि दिवि भूमौ रसातले ।
          बदरी सदृशं तीर्थ, न भूतो न भविष्यति।।

शास्त्रों में यह उद्घोष है कि पृथ्वी पर अनेक तीर्थ, अनेक धाम हैं लेकिन श्री बदरीनाथ जैसा तीर्थ ना कभी हुआ था और न भविष्य में कभी होगा ।।

"शास्त्रों ने श्री बदरीनाथ धाम को पृथ्वी का साक्षात भू - बैकुंठ बताया है"

श्री बदरीनाथ जी का मन्दिर नर - नारायण पर्वतों की गोद में नीलकंठ पर्वत श्रृंखलाओं के नीचे समुद्र तल से लगभग 3133 मीटर की ऊंचाई पर बसा हुआ है।

5 जून 2019 को हम सपरिवार 4 लोग, अनुपम चाचा,चाची और अभिनव के साथ बद्रीनाथ के दर्शन के लिये सुबह 7 बजे घर से निकले। इलाहाबाद हरिद्वार एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से  एक घंटे देरी से सुबह 10:00 बजे  शाहजहांपुर स्टेशन पर आ गई। हम सभी लोग ट्रेन में सवार होकर  हरिद्वार के लिये बैठ गए। सभी लोगों का रिजर्वेशन था पर मेरा रिजर्वेशन नहीं था, क्योंकि मेरा जाने का कोई विचार नहीं था। इस लिये मैंने कोई रिजर्वेशन नहीं कराया था। खैर थोड़ी देर बाद ट्रेन चल दी। 6 घंटे बाद हम लोग हरिद्वार पहुँच गए। हरिद्वार पहुँच हम लोग होटल देखने चले गए। कुछ समय बाद 2 कमरे बिल्कुल हर की पौड़ी के पास होटल में मिल गए। हम  सभी लोग तुरंत होटल में सामान रखकर हर की पौड़ी घाट पर गंगा  जी में स्नान करने चले। फिर गंगा जी में 1घण्टें तक स्नान करके वापस होटल में आ गए। अब बहुत भूख सताने लगी थी। 
अब घर से लाया हुआ खाना खाया गया। होटल से राजमा की सब्जी हमने मंगाई थी। अभिनव ने अलग अपना पनीर भोजन किया था और सभी लोगों ने  होटल में साथ में खाना खाया था।
हर की पौड़ी हरिद्वार

 घर का बना हुआ खाना बहुत ही स्वादिष्ट लगा था।  अभिनव ने रात में ही बद्रीनाथ के लिये। ऑनलाइन बुकिंग  वातानुकूलित बस में कर दी पर यह ऋषिकेश से थी। हम लोग सुबह 4 बजे ऋषिकेश पहुँच गए उसके बाद बस में बैठ गए  बस अपने निर्धारित समय 7 बजे बद्रीनाथ धाम के लिये चल पड़ी।  पीक सीजन की वजह से उत्तराखंड में काफी भीड़ भाड़ था। रास्ते में जगह जगह जाम लग रहा था। सुबह से चले चले हम लोग शाम के 7 बजे चमोली पहुँचे थे। फिर चमोली में बस के जाम में फँस जाने के कारण चमोली में नाश्ता किया। हेमकुंड यात्रा भी उसी समय पर चल रही थी। इस कारण भी काफी भीड़ भाड़ था। हम लोग लगभग 3 बजे सुबह बद्रीनाथ पहुँचे थे। अब सबसे बड़ी समस्या होटल ढूंढने की थी। मैं पहले बद्रीनाथ आ चुका था और सब लोग पहली बार आये थे। हम अभिनव  कमरा ढूंढने निकले। कमरों के रेट बहुत ज्यादा थे। लगभग 1 घंटे तक होटल देखने के बाद जब कमरा न मिला। तब थक हारकर हम और अभिनव  बद्रीनाथ मंदिर पहुँचे मंदिर में बद्रीनाथ जी से हाथ पैर जोड़कर कर वापस आए तब तक अनुपम चाचा और मम्मी ने होटल ले लिया था। होटल बहुत ही शानदार जगह पर था। होटल से ही बद्रीनाथ जी का मंदिर दर्शन हो रहे थे। सामने नील कंठ शिखर भी दिख रहा था।
2
फिर कुछ देर  तक होटल में नींद लेकर हम सभी लोग सोकर उठे। फिर नहा धोकर मंदिर दर्शन के लिए तैयार हुए। हम अनुपम चाचा ,चाची, मम्मी साथ में बद्रीनाथ दर्शन के लिये चल पड़े। 
बद्रीनाथ जी के मंदिर के पास सभी लोगों ने बहुत फोटो क्लिक किये थे। मम्मी बहुत खुश थीं कह रहीं थी बहुत अच्छा लग रहा है।  10000 फ़ीट की ऊंचाई पर पहली बार गईं थीं। वह अलकनंदा जी को निहार रहीं थीं। अलकनंदा नंदा जी अपना अखंड कीर्तन कर रहीं थी। अनुपम चाचा कह रहे थे, बहुत ही सुंदर प्राकृतिक वातावरण है। वह नारायण पर्वत को देख रहे थे।  कह रहे थे जल्दी चलो नहीं तो मंदिर में भीड़ और बढ़ जाएगी। हम लोग बद्रीनाथ मंदिर आ चुके थे,प्रसाद खरीद कर सभी लोग लाइन में लग गए। लाइन लगभग 500 मीटर लंबी थी। एक घंटे लाइन में लगने के बाद श्री बद्रीनाथ जी के दर्शन हुए। मंदिर में नर, नारायण कुबेर भंडारी के दर्शन कर  उनका  नाम लेकर हम सभी लोग बाहर निकले। अब ठंड बढ़ चुकी थी। मम्मी को बहुत ठंड लग  रही थी। मम्मी को ठंड की वजह से होटल में पहुंचने की जल्दी थी। 
 हम मम्मी चाची और चाचा के साथ जब होटल आए तो अभिनव    ने कहा अब मेरे साथ भी चलो  फिर अभिनव के साथ बद्रीनाथ जी के दर्शन दोबारा किये।  बद्रीनाथ जी के दर्शन करने से बहुत ही शांति का अनुभव हो रहा था। लौटते वक़्त खाना खाकर हम लोग होटल आ गए। मम्मी ने उस रात खाना होटल में ही खाया था। भोजन कर हम सभी सो गए थे।
3
दूसरे दिन हम लोगों ने माना भ्रमण का प्लान बनाया। 11 बजे हम लोग होटल से निकले।200 रुपए में एक गाड़ी कर ली उससे हम सभी लोग माना गाँव पहुँचे। माना गाँव भारत चीन सीमा पर  आखिरी गाँव है। यहां का प्राकृतिक वातावरण बिल्कुल स्वर्ग जैसा है। इस गाँव के संबंध में मान्यता है कि पांडव इसी रास्ते से स्वर्ग गए थे।

यहाँ पर अलकनंदा और सरस्वती जी का संगम है। 
हम लोग 2-3 घंटे में माना गाँव घूम कर वापस होटल आ गए। उसके बाद हम अभिनव के साथ 3 बजे चरण पादुका मंदिर तक गए। चरण पादुका मंदिर जातें साधु महात्मा की छोटी छोटी गुफाएं भी  मिल रहीं थीं। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि अगर धरती पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है। चरण पादुका मंदिर के संबध में मान्यता है कि यहां भगवान बद्रीनाथ के चरण हैं। चरण पादुका मंदिर के दर्शन कर लौटते वक्त रात के 9 बज गए थे। वहाँ से पूरा बद्रीनाथ दिख रहा था। बहुत ही भव्य और सुंदर नजारा था। लगभग 9 बजे हम होटल में पहुँचे।इस समय ठंड बहुत थी। मम्मी ने कहा कि अब घर चलते हैं। फिर हम लोग अगले दिन हरिद्वार के लिये चल पड़े। सुबह 7 बजे बद्रीनाथ  से चली बस ने शाम 4 बजे हरिद्वार उतार दिया। अब होटल देखना समस्या थी। अगले दिन दशहरा था। पूरे हरिद्वार में बहुत भीड़ थी। काफी होटल देखने के बाद एक धर्मशाला 500 रु प्रतिदिन पर मिली। ट्रेन में रिजर्वेशन न होने की वजह से 2 दिन हरिद्वार में और रुकना पड़ा।
फिर तीसरे दिन दून एक्सप्रेस में रिजर्वेशन मिला तब जाके हम सभी लोग सकुशल अपने घर वापस आ चुके थे। श्री बद्रीनाथ जी की पवित्र यात्रा समाप्त हुई। 

चरणपादुका मंदिर 

                     नीलकंठ शिखर               चरण पादुका के रास्ते झरना
हम और मम्मी नीचे सरस्वती नदी यह चित्र माना गाँव का है।


         सरस्वती नदी का उद्गम स्थल 


जय श्री बद्रीनाथ 

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

मसूरी यात्रा 2025

केदारनाथ यात्रा 2022

भारत परिक्रमा 2022